डिप्टी स्पीकर पद खाली रहने पर विपक्ष का सरकार पर निशाना
नई दिल्ली|लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद नौ साल से खाली है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने इसी बात पर केंद्र सरकार को घेरा है। उन्होंने सरकार पर संसद का मजाक बनाने का आरोप लगाया है। ओ ब्रायन का कहना है कि सरकार संसदीय कामकाज को गंभीरता से नहीं ले रही है और देश के सबसे बड़े विधायी निकाय के संवैधानिक पदों की गरिमा का ध्यान नहीं रख रही है।
ओ ब्रायन ने सरकार के दोहरे मानदंड पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सीधे-सीधे कहा, लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद साल 2019 से खाली पड़ा है। मौजूदा सरकार ने इतने लंबे समय तक इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद को भरने की कोई कोशिश नहीं की है। वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा के उपसभापति का पद सिर्फ दस दिन पहले खाली हुआ है, और इसे भरने के लिए भाजपा इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रही है? यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सरकार अपनी राजनीतिक सुविधा और तात्कालिक लाभ के हिसाब से संसदीय प्रक्रियाओं को अपनाती है, न कि संवैधानिक दायित्वों और परंपराओं के तहत।
डेरेक ओ ब्रायन ने राज्यसभा उपसभापति चुनाव की तारीख पर आपत्ति जताई
सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने राज्यसभा उपसभापति चुनाव की प्रस्तावित तारीख पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने बताया कि भाजपा यह चुनाव 17 अप्रैल को करवाना चाहती है। उनके अनुसार, इस समय देश के कई हिस्सों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में सांसद अपने-अपने राज्यों में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। वे अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए अभियान चला रहे हैं, रैलियों में भाग ले रहे हैं और जनसभाएं कर रहे हैं।
ओ ब्रायन का तर्क है कि जब बड़ी संख्या में सांसद चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं, तब सदन में इस तरह का महत्वपूर्ण चुनाव कराना सरासर गलत है। इससे कई सांसद मतदान में हिस्सा नहीं ले पाएंगे, जिससे चुनाव की निष्पक्षता, वैधता और प्रतिनिधित्व पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को ‘शर्मनाक’ बताया है। उनके अनुसार, यह संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का सीधा अनादर है, जहां सभी निर्वाचित सदस्यों को महत्वपूर्ण चुनावों में भाग लेने का समान और उचित अवसर मिलना चाहिए।
संवैधानिक पदों की अहमियत और सरकार का दोहरा रवैया
लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद सदन के अध्यक्ष (स्पीकर) के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के तहत, लोकसभा को यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनने का प्रावधान है। यह पद स्पीकर की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही का संचालन करता है, महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा कराता है और नियमों के तहत सदन की गरिमा बनाए रखता है। नौ साल से इस पद का खाली रहना न केवल संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी है, बल्कि यह संसदीय लोकतंत्र की मजबूती पर भी गहरा सवाल उठाता है। यह दर्शाता है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।
इस लंबी रिक्ति ने विपक्ष को सरकार पर लगातार हमला करने का मौका दिया है। विपक्षी दल कई बार इस मुद्दे को संसद के अंदर और बाहर उठा चुके हैं। उनका आरोप है कि सरकार जानबूझकर इस पद को खाली रखे हुए है ताकि सदन में अपनी मनमानी चला सके और स्पीकर पर पड़ने वाले काम के दबाव को कम न होने दे, जिससे कहीं न कहीं सदन की निष्पक्षता प्रभावित होती है। इस पद के न होने से स्पीकर पर अतिरिक्त कार्यभार पड़ता है और कई बार सदन की कार्यवाही में भी रुकावटें आने की आशंका रहती है। हालांकि, सरकार की तरफ से इस लंबी रिक्ति पर कोई संतोषजनक या स्पष्टीकरण अभी तक नहीं आया है, जिससे विपक्ष के आरोप और मजबूत होते दिख रहे हैं।
वहीं, राज्यसभा के उपसभापति का पद भी ऊपरी सदन में सभापति की अनुपस्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सुनिश्चित करता है कि विधायी कार्य बिना किसी बाधा के आगे बढ़े और सदन की कार्यवाही सुचारू रहे। दस दिन की रिक्ति पर चुनाव की जल्दबाजी और लोकसभा में नौ साल से चल रही रिक्ति पर चुप्पी, यह अंतर स्पष्ट रूप से सरकार के दोहरे रवैये को उजागर करता है। डेरेक ओ ब्रायन का यह आरोप कि सरकार ‘संसद का मजाक बना रही है’, इसी विरोधाभास और असमानता को दर्शाता है, जहां एक ही सरकार दो सदनों में अलग-अलग मानक अपना रही है।
महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों की लंबित नियुक्तियां गंभीर चिंता का विषय
संसदीय लोकतंत्र में ऐसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों का खाली रहना या उन्हें भरने में अत्यधिक देरी करना गंभीर चिंता का विषय है। यह दिखाता है कि सरकार किस तरह से संवैधानिक प्रावधानों, परंपराओं और संसदीय गरिमा को नजरअंदाज कर रही है। डेरेक ओ ब्रायन ने जो सवाल उठाए हैं, वे सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी के आरोप नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय लोकतंत्र की नींव और उसकी कार्यप्रणाली से जुड़े मौलिक प्रश्न हैं। इन सवालों का जवाब और समाधान न केवल सरकार के लिए बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, ताकि संसदीय संस्थाओं में जनता का विश्वास बना रहे।
फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस के सांसद ने केंद्र सरकार पर संसद के कामकाज को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। लोकसभा डिप्टी स्पीकर पद की नौ साल की रिक्ति और राज्यसभा उपसभापति चुनाव की जल्दबाजी को उन्होंने ‘शर्मनाक’ बताया है। अब देखना होगा कि सरकार इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और इन महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों को लेकर आगे क्या कदम उठाती है, खासकर तब जब विपक्ष इस मुद्दे को लगातार उठा रहा है और इसे एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के तौर पर देख रहा है।


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