मायावती की चुनावी शुरुआत लखनऊ से, बीजेपी और सपा के बीच BSP के लिए चुनौतीपूर्ण रास्ता
UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को भले ही अभी 1 साल से ज्यादा का समय बचा हुआ है, लेकिन सभी दलों ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी है. समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने हाल ही में नोयडा के दादरी से ही पश्चिम सियासत में हलचल पैदा कर दी है. यहीं से चुनावी अभियान की शुरुआत भी मानी जा रही है. यूपी की सत्ता से कई सालों से दूर रहने वाली मायावती की पार्टी भी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए रणभूमि में उतरने की कोशिश कर रही हैं. मायावती 14 अप्रैल को लखनऊ से चुनावी हुंकार की शुरुआत करेंगी. विपक्षी दलों के साथ ही सीएम योगी और पीएम मोदी भी तैयारियों में जुट गए हैं. यानी चुनाव के लिए भले ही अभी काफी समय बचा है लेकिन सभी दलों ने यूपी की सियासत में चुनावी रंग घोल दिया है.
इस बार का मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) के लिए काफी अहम रहने वाला है. क्योंकि मायावती अपनी खोई हुई जमीन को वापस लाने के प्रयास में हैं. मायावती इस साल मिशन-2027 के आगाज के लिए अपना प्लान तैयार कर लिया है. आने वाले 14 अप्रैल को डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की जयंती के अवसर पर लखनऊ में भव्य कार्यक्रम आयोजित होने वाला है. यहां पर लाखों की तादात में लोगों के जुटने की उम्मीद है. मायावती यहीं से अपनी सियासी ताकत का एहसास भी कराना चाहती हैं.
14 अप्रैल को लखनऊ से मिशन-2027 का आगाज
मायावती का रिकॉर्ड रहा है कि वे हर साल विधानसभा चुनाव से करीब 1 साल पहले चुनावी तैयारियों में जुट जाती हैं. ऐसे में 14 अप्रैल को होने वाले कार्यक्रम को मिशन-2027 का आगाज माना जा रहा है. यूपी की सियासत में मायावती की सक्रियता कम होने का सभी पार्टियों ने खूब फायदा उठाया. इसको देखते हुए मायावती ने अपने खिसकते वोटरों को मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है. अगर मायावती अपने कोर वोटरों को साधने में सफल नहीं हुईं, तो उनके लिए काफी नुकसान होगा. हालांकि, मायावती के वोटरों पर भाजपा, कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी तक की निगाहें टिकी हुई हैं.
अकेले चुनाव लड़ेंगी मायावती
हालांकि मायावती ने साफ किया है कि वे किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी. यानी वे आने वाले विधानसभा चुनाव में अकेले ही मैदान में उतरेंगी. मायावती का सबसे ज्यादा फोकस पश्चिमी यूपी है. उनका मानना है कि अगर इन इलाकों में दलित और मुसलमान के वोटों पर अगर कांग्रेस और सपा में से किसी ने सेंध लगा दिया, तो बसपा के लिए काफी बड़ा झटका होगा. क्योंकि काफी समय से सपा और कांग्रेस ने मुसलमानों और दलितों पर अपना विशेष फोकस रखा है. दोनों पार्टियों की रैलियों में भी जय भीम के नारे लगाते सुनाई देते हैं. फिलहाल, यूपी की सियासत में अखिलेश यादव के चुनावी बिगुल बजते ही मायावती भी एक्टिव हो गई हैं. अब देखना यह होगा कि आखिर अब मायावती अपनी साख बचाने के लिए क्या रणनीति अपनाती हैं.


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