मिडिल ईस्ट युद्ध पर सलमान चिश्ती की अपील, कहा—ताकत नहीं शांति का रास्ता चुनें
अजमेर। दुनिया में बढ़ते युद्ध, राजनीतिक तनाव और हिंसक संघर्षों के बीच अजमेर दरगाह शरीफ के गद्दीनशीन और चिश्ती फाउंडेशन के अध्यक्ष हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने सूफी दृष्टिकोण से युद्ध की नैतिकता पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा कि इस्लाम और सूफी परंपरा में युद्ध को कभी शक्ति या विजय का उत्सव नहीं माना गया, बल्कि इसे अन्याय के खिलाफ एक सीमित और दुखद परिस्थिति में अपनाया जाने वाला अंतिम उपाय माना गया है। उन्होंने कहा कि सूफी शिक्षाओं के अनुसार सबसे बड़ा युद्ध मैदान में नहीं, बल्कि इंसान के भीतर लड़ा जाता है। यह युद्ध मनुष्य के अहंकार, क्रोध, लालच और घृणा के खिलाफ होता है। पैगंबर हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस आंतरिक संघर्ष को “जिहाद-अल-नफ़्स” यानी सबसे बड़ा जिहाद बताया है। चिश्ती ने कहा कि कुरआन में युद्ध की अनुमति केवल आत्मरक्षा और अत्याचार से बचाव की स्थिति में दी गई है। कुरआन की आयत (अध्याय 2, आयत 190) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जो तुमसे लड़ते हैं उनसे लड़ो, लेकिन सीमा का उल्लंघन मत करो, क्योंकि अल्लाह अतिक्रमण करने वालों को पसंद नहीं करता। उन्होंने बताया कि इस्लाम में युद्ध के दौरान भी मानवीय मूल्यों का पालन अनिवार्य है। पैगंबर मोहम्मद ने महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, साधुओं और अन्य गैर-लड़ाकों को नुकसान पहुंचाने से स्पष्ट रूप से मना किया था। साथ ही फसलों, जल स्रोतों और पूजा स्थलों को नष्ट करने की भी मनाही की गई है। ये सिद्धांत आज के आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों से भी मेल खाते हैं।
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सलमान चिश्ती ने कहा कि इतिहास में नैतिक संयम का सबसे बड़ा उदाहरण मक्का विजय के समय देखने को मिला, जब वर्षों के उत्पीड़न और संघर्ष के बाद भी पैगंबर मोहम्मद ने अपने विरोधियों को दंड देने के बजाय आम माफी दे दी। उनके अनुसार सूफी परंपरा में असली जीत दुश्मन को हराने में नहीं, बल्कि क्षमा और करुणा दिखाने में मानी जाती है। उन्होंने चेतावनी दी कि धर्म का इस्तेमाल हिंसा और कट्टरता को सही ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सच्चा धर्म सत्ता को नियंत्रित करता है, न कि हिंसा को पवित्र बनाता है। अजमेर शरीफ के महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता भी इसी विचारधारा को मजबूत करती है, जहां सूफी संतों, भक्ति आंदोलन, गुरु नानक की शिक्षाओं और महात्मा गांधी की अहिंसा की विचारधारा ने हमेशा करुणा, समानता और मानवता को सर्वोपरि रखा है। चिश्ती ने कहा कि आज की जुड़ी हुई दुनिया में युद्ध के प्रभाव केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहते, बल्कि देशों, अर्थव्यवस्थाओं और समाजों पर गहरा असर डालते हैं। इसलिए मानवता की सच्ची जीत युद्ध में नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता, संवाद और न्याय के माध्यम से संघर्ष को रोकने में है। उन्होंने सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा कि अपनी आवाज नहीं, अपने शब्द ऊंचे करो। फूल गरज से नहीं, बारिश से खिलते हैं। अंत में उन्होंने कहा कि सूफी दृष्टिकोण में युद्ध ताकत का उत्सव नहीं, बल्कि मानवता की विफलता है। इसका उद्देश्य केवल अत्याचार को रोकना और निर्दोषों की रक्षा करना होना चाहिए, जबकि अंतिम लक्ष्य इंसान के दिल में करुणा, न्याय और एकता की भावना को जगाना है।


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