छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हत्या का दोष गैर-इरादतन हत्या में बदला
Chhattisgarh High Court verdict : में एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले में बड़ा बदलाव करते हुए सत्र न्यायालय के फैसले में आंशिक संशोधन किया गया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने हत्या के दोष को गैर-इरादतन हत्या में परिवर्तित कर दिया और आरोपियों को आजीवन कारावास से राहत देते हुए उनकी पहले से भुगती गई सजा को पर्याप्त मानकर रिहा करने का आदेश दिया। यह निर्णय न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने आपराधिक अपील पर सुनाया।
मामले के अनुसार, 15 मई 2014 को सक्ती थाना क्षेत्र में एक शादी समारोह की तैयारी के दौरान मंडप के लिए लकड़ी काटने को लेकर विवाद हुआ था। इस दौरान आरोपियों सुकुल और उमाशंकर तथा मृतक छोटेलाल के बीच मामूली झगड़ा हुआ, जो देखते ही देखते हिंसक हो गया। आरोपियों ने छोटेलाल के साथ हाथ-मुक्कों और लातों से मारपीट की, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं। अगले दिन चोटों के कारण उसकी मृत्यु हो गई।
सत्र न्यायालय ने वर्ष 2016 में दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, Chhattisgarh High Court verdict में अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान और चिकित्सकीय साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए माना कि घटना अचानक हुई थी और हत्या का कोई पूर्व नियोजित इरादा नहीं था। हमला केवल हाथ-मुक्कों और लातों से किया गया था, जिससे यह साबित होता है कि आरोपियों को केवल मृत्यु की संभावना का ज्ञान था, न कि हत्या का स्पष्ट उद्देश्य।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए मामले को धारा 304 भाग-दो के तहत गैर-इरादतन हत्या माना। Chhattisgarh High Court verdict के अनुसार, आरोपियों द्वारा पहले ही 5 वर्ष 6 माह से अधिक जेल में बिताई गई अवधि को पर्याप्त सजा मानते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया गया है।


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